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International Advanced Research Journal in Science, Engineering and Technology
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ISSN Online 2393-8021ISSN Print 2394-1588Since 2014
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संत रैदास के जीवन मूल्यों की प्रासंगिकता

कृति कुमारी

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सारांश: भारत के इतिहास में मध्यकालीन काल धार्मिक संघर्षों का युग था, और सांस्कृतिक संकटों से गुजर रहे खंडित समाज का पुनर्गठन या सुधार केवल धर्म की भाषा के माध्यम से ही किया जा सकता था। इसलिए सभी सामाजिक सुधारकों या महान व्यक्तित्वों को समाज द्वारा राजनीतिक विचारकों के रूप में नहीं, बल्कि केवल धार्मिक भक्तों, धार्मिक शिक्षकों या संतों के रूप में ही स्वीकार किया जा सकता था। संत शिरोमणि गुरु रविदास भी उनमें से एक थे। प्रारंभ में वे क्षत्रिय चंवर वंश से जुड़े चमार समुदाय के संत थे, और यहां तक कि ब्राह्मण भी उनके घर से भोजन और दान स्वीकार करते थे, लेकिन जब सिकंदर लोदी ने इस्लाम स्वीकार करने से इनकार करने पर उनका अपमान किया और उन्हें “चमार” कहकर चमड़े का काम करने के लिए मजबूर किया, तब लोगों ने उन्हें “अछूत” कहना शुरू कर दिया। इसी प्रकार के उत्पीड़न, प्रताड़ना, शोषण और विनाश की घटनाएं कई अन्य स्वाभिमानी समुदायों के साथ भी हुईं, और वे सभी समुदाय जिन्हें विदेशी मुस्लिम शासकों द्वारा जबरन कुचल दिया गया, “दलित” कहलाने लगे।

मुख्य शब्द: अछूत, उत्पीड़न, प्रताड़ना, शोषण और विनाश आदि। 

How to Cite:

[1] कृति कुमारी, “संत रैदास के जीवन मूल्यों की प्रासंगिकता,” International Advanced Research Journal in Science, Engineering and Technology (IARJSET), DOI: 10.17148/IARJSET.2026.13725

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